परिणामस्वरूप, ऑयस्टर को काम करने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने हेतु, उसे नियमित रूप से वाइंड करना पड़ता था। इसका मतलब था कि इसके जल प्रतिरोधी वाइंडिंग क्राउन को खोलना पड़ता था, जिससे घड़ी के बाहरी और भीतरी हिस्से के बीच की रुकावट टूट जाती थी, और नमी तथा अशुद्धियाँ अंदर प्रवेश कर जाती थीं।
ऑयस्टर कॉन्सेप्ट को पूरा करने और घड़ी की मशीन के लिए सचमुच एक पूरी तरह से बंद माहौल सुनिश्चित करने के लिए, एक ऐसा तरीका खोजना ज़रूरी था जिससे इस समस्या से बचा जा सके और घड़ी की मशीन बिना किसी बाहरी ऊर्जा की मदद के खुद ही रिवाइंड हो सके। 18वीं शताब्दी में ही, जाने-माने घड़ीसाज़ों द्वारा जेब घड़ियों में 'सेल्फ़-वाइंडिंग' की सुविधा लाई जा चुकी थी। 1920 के दशक में, इसका इस्तेमाल कलाई घड़ियों में भी फैल गया, हालाँक ि यह कभी भी बहुत संतोषजनक नहीं रहा।